चौक.....

=====चौक====22/05/15

ताजा पके सब्जी मसाले सा
ललचाती है कभी चौक..
तीखे मिर्चों सा कभी कभी
लरज जाती है तभी चौक....

बुंबुंआ  बुंबुंआ के रोती है
दिन,दोपहर,रात यह
जब अपनी बहन की आबरू
लुटते देख जाती है भरी चौक...

ब्रम्चार्यालय की दीवाल फांद
निकल आये थे कुछ छात्र
अक्सर बैठे रहते हैं जो
नुक्कड़ की चाय दूकान हरी चौक...

सफ़ेद पाशों के दामाद बने है
बिगडैल बिटिया को छेड़
रिश्तें में खाकी के जीजा हैं
तभी इनसे है आज डरी चौक...

पिसता तो बिन्दौरी रोज
माध्यम मुलायम इन्सान है
क्या कभी देखा है तुमने
पिसते गांठ हल्दी खड़ी चौक...

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