मुसाफिर अनजान हूँ जैसे…
घी का कच्चा घड़ा हो दिल
बेधा मुझमें उसका प्यार है ऐसे…
ये धड़कन ऐसे धडकती है
उसका अधिकार हो जैसे…
बेदनाओं का पता है बस
ख़ुशियाँ आज नर्वस हैं ऐसे…
आँखे उन्हे ही तलासती हैं
वो मंज़िल का पता हो जैसे…
अब कंकड भी उलझते हैं
सफर से अनजान हूँ ऐसे…
बिन्दौरी किस्मत मुझे दिखती है
मुसाफिर हूँ फिरभी बदनाम हूँ जैसे…
आमोद बिंदौरी 5/5/15
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