यादें Vs. बदलाव

यादें Vs. बदलाव

गर्मियों की छुट्टी में मेरे गाँव घर
रिस्तेदारों का मजमा रहता था …
कुछ ममेरू -फुफेरु कुछ पारिवारिक
गाँव घर जमाकडा रहता था…

एक सरसों और बिजरी तेल से नमक लिपटी रोटी
संग प्याज का एक टुकड़ा भूख मिट जाया करती थी

सबकी जरूरते यूँही पूरी हो जाती थी
ज़मीन में सोने पर भी रुतबा बना रहता था…

सभी के पास काम के लिए सहयोग भाव थे
आराम परस्ती से मुकदमा बना रहता था…

बच्चो के झगड़े तब भी होते थे…
यह हास्य पद नग़मा बना रहता था…

तब पढ़ाई जुलाई से मार्च होती थी,
3 माह गाँव रहने की कामना बनी रहती थी…

चिठ्ठियाँ एक माह में आती ज़रूर थी
उनमें प्यार का अक्श बना रहता था

प्रगति की आँधी ने हर चीज बदल दी
समय ने  हर दीवाल पर टी बी जड़ दी

लू …हर किसी को लग जाती है पल में,
लोगो ने रहन सहन की सोसायटी बदल ली…

मृदा इफेक्टेड करती है त्वचा को…
डाक्टर ने यह तिजोरी जड़ दी…

अब चाचा को छुट्टिया न होने का बहाना है
चाची ने चाचा को चाभी भर दी…

बच्चे गाँव की ज़िद भी किया करे तो…
टीचर ने सेमेस्टर की घुडकी जड़ दी…

प्रगति ने बच्चो की छुट्टियाँ हर ली…
बिन्दौरी इन्सानो ने फितरत बदल ली …

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