ग़ज़ल

अफ़साना नहीँ आमाल है यह
खुलफामे नज़र रखा कर अपने शहर में
इशरत रख गामा तफशीर में
बेरुखी का मकाम है तेरे शहर में

अब फैज समझ दरिया दिली मेरी
आफताब हूँ मे अब तेरे शहर में

अल्फाजे खुदी तू अब बयां कर दे
पुरआना नबीना चमन है तेरे शहर में

बिंदौरी रंगखुदी हालात गुरबत है अपने
परवाज़ नज़रें उल्फत तल्खी ले आया हूँ तेरे शहर में

अफ़साना _ बड़ी कहानी ,लम्बी कहनी
आमाल - कर्म
गुलफाम- हँशमुख नज़र
इसरत- ख़ुशी
गामा- राह
तफसीर- व्याख्यान ,परिभासित
बेरुखी- मतलब न रखना ,ध्यान न देना
  मकाम - ठिकाना
पुरअना- घमंडी
नबीना- द्रस्टि हीन , अंधा
गुरबत - ग़रीबी
तल्खी- सक्त ,कठोर ,पत्थर

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