मैने झाँका हैं…वो बात नहीँ संगेमरमर में…

मैने झाँका है…

मैने झाँका है…
घर के पौढ की आँखों में…
मैने झाँका है…
बूढ़ी माँ की आवाजों में…

मैने झाँका है…
उस पौढ की तर्जनी उँगली में…
मैने झाँका है…
कन्धा बैठाए बचपन में…

मैने झाँका है…
कोने में पड़ी ममता में…
मैने झाँका है…
गंगा से पावन उस मन में…

बिन्दौरी  वो चीज वही पर पाया
मैने झाँका है…
माँ बाप के प्यार के दर्पन ने …

महसूस किया है…
बेईमानी दूध की गरिमा की…
महसूस किया है…
बहुओं को शहर बिडम्बना की…

महसूस किया है…
बहाना …गाँव न आने का…
महसूस किया है…
सेवा को … काम बताने का…

महसूस किया है…
तबियत बीबी की बिगडी है।
महसूस किया है…
बेटे की स्कूल एसेम्बली है।

अब पाक नहीँ है वो बचपन…
महसूस किया है…
दोगले बेटे का जीवन…

मैने  फिर भी पाया है…
अब भी विस्वास उस बूढ़े तन में…
मैने  फिर भी पाया है…
प्यार बूढ़ी जुबान के लिचले तल में…

बिंदौरी !
अब भी सुन्दर है वो बूढ़ा मंदिर
वो बात नहीँ नये संगमरमर में…

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