पर है कोशिस उड़ूँ कुतरे पर में
बस है कोशिस उड़ूँ कुतरे पर में।।
बह्र - 2122-1221-22
इतना उलझा है आदम बसर में।।
खुद से पूछे वो है किस सफर में ।।
क्या समझ पाएगे रात भर में।।
फर्क है इस नजर उस नजर में।।
ना बदल पाऊं बिलकुल न बदले।
पर है कोशिस उड़ूँ कुतरे पर में।।
अपनी मंजिल से है ला पता जो ।
चीखता फिर रहा, रह-गुजर में।।
हर मुसाफिर की कोशिस यही बस।
सब सलामत रहे मेरे घर में।।
जब से उनसे मुहब्बत हुई है।
कोई उन सा नहीं ,इस नजर में।।
आज फिर प्यार से उसने देखा ।
है गजब का नशा, हम-नजर में।।
आमोद बिन्दौरी /मौलिक- अप्रकाशित
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