जिंदगी बहना चाहती है
मोन रह के क्या कहना चाहती है।
जिंदगी फिर बहना चाहती है।।
सर पटक पत्थरों पर , करती है विलाप
मुस्कुरा कर गम सहना चाहती है।
आज कुछ जो ठहराव है इसकी गति में
लगा दो आब में छहरना चाहती है।
लाई है लाद आवेश में समेट संग जो यादें
बिन्दौरी टोकरी रख मुहाना बनना चाहती है।
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