लडखडा कर आज भी गिरते रहे..
लड खड़ा कर जोआज भी हम गिरते रहे
सच तो ये है हम फलक के तारे गिनते रहे
टांक की टूटी कटोरी के घाव जो अब भी हरे
मंदिर की सीढियाँ हम टांक के बल चढते रहे
मन्नते मांगी बहुत तोड़े बहुत से नारियल
तेरे प्यार में पड़ कर हम दर-दर भटकते रहे
एक वही तस्वीर और अंतिम फैसला
बार बार खोल कर चेहरा तेरा पढ़ते रहे
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें