बेबश इमान
ईमानदारी
कही न कही
हर बार हार कर...
अकेले में मुझसे
बस
सुगबुगाते
बात करती है ...
और मन ही मन
बड़ी पंडित बन
इमान को दरिद्रा स्थित
पर
दुद्कारती है....
ईमान
अपनी परिस्थित को
चुप चाप
फटी सी साफी
में पोंछ लेता है....
और
सांसे
एक आह ले
अपनी बेज्जती सह
प्रवाह मंद कर
बहतीं हैं...
आज परिस्थित ही
ऐसी है ....
सच की ......
यह मुह उठा कर
कभी जवाब नहीं
देता ......
और झूठ
हँसता हुआ
संपूर्ण समाज में
थिल्ल्हाव करता है...
सोंचता हूँ
आज ये चोला
उतार फेकू ....
उतार फेकू संस्कार
कर दूँ त्रिरश्क्रित
सभ्यता ...
बंद करवा दूं
ये थिल्ल्हाव सिल शिला...
मै भी सामिल हो जाऊ
इसी की समाज में...
रंग लू खुद को
इन सियारों की तरह
और
गिरगिट की तरह
बन
बेईमानी
के तलुए चाट लू....
कल चमचमाती
काया में
ह्रदय ...
आइने को कह देगा
अबे तू अँधा को गया है
तू जलता है
मेरी सम्रधि से...
क्या करूँ????
अब भी दो राहे पर
खड़ा हूँ
और
पता नहीं
बाढ़ आयी आँखे ले
क्या टटोल रहा हूँ
मन की गहराई में....
लगता है
जैसे कोई कहेगा
रुक!!!!
जैसे
आज के बाद
मै ख़त्म हो जाऊंगा...
चौराहे पर खड़ा हो
खुद के योवन को
जिस्म फरोक्त
बाजार पर बेच रहा हूँ।...
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