हु बा हु
वेदनाओं से जो लिपटी
याद मुड़ आई इधर...
.बिलकुल साफ थी तस्वीर तेरी..
.बादलों की धुंध पर....
देखती थी बिना झपके....
एक टक निगाहे गौर से...
हाँ वही हु-बा-हु चेहरा..
दिख रहा इस दौर पर....
बह रहे दो धार दरिया...
घाटियों में खार से...
था वही पथरीला पथ
त्रिश्नगी की आभ पर...
बांट चुका था मै और वो
दो किनारों में दो धारों पर...
बन गया दो -आब था
हिस्सा वही इस प्यार पर...
आमोद बिन्दौरी
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