कह रहा हूँ रोज कविता

कह रहा हूँ रोज कविता
प्रेम करुणा से भरी
इससे जुदा होना कभी भी
मेरे बस में है नही
लिख रहा हूँ रोज पन्ने
जो भी जैसा जानता
कौन सी है ये विधा
समझाना मेरे बस में है नही
अब उठी है जो कलम
तो अब न ठहरेगी कहीं
क्या सफ़र होगा ये कहना
आज भी बस में है नही
कह रहा हूँ रोज कविता
प्रेम करुणा से भरी------आमोद बिन्दौरी

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