एक गुनाह
सोंचता हु अब मै भी
ओढ़ लूँ चोला
रंग जाऊ गुनाह के रंग
एक गुनाह करके.....
जब आइना से
सामना होगा
उसे तोड़ दूंगा/ भद्दा कह के......
किसकी सिकायत
कौन करेगा
और करेगा तो किससे
ये सब सियासतें....
बस काम होना चाहिए
उजला काला
कैसा भी
अब सोचताहूँ
छोड़ दू परवाह
रंग जाऊ मै भी
समाज के एक रंग में ....
आमोद बिन्दौरी
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