लौट ही आना था
आख़िर लौट ही आना था
परछँइयों के पीछे जो भाग रहा था
वो हवा के साथ चल रही थी
और मैं …कदम दर कदम
लोगों ने मेरे तोहफ़े गैरत से फेके
तोहफे…आख़िर लाश बन गये
ये समाज तमाशा बनाता रहा
हम तमासाई बन गये
अरे इस लत की क्या कहे बिंदौरी
कई बार औधे मुँह गिरे हैं
हर बार हौसले उठाते थे
इसबार आप के हाथ थे
काँरवाँ चलता रहा ता-उम्र
उलझन और परे शनियों का
हर कदम पर मात
और मुकद्दर की अँगडाइयों का
आमोद बिन्दौरी
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