तुम कब लौटोगे

अनायास की उलझान लेके
जीती हूँ मे जीवन लेके

आश लगाए नजरे पनघट
हवा के झोके उपवन लेके

गौरैया हर प्रभा को आँगन
झोंझ बनाए किरणे लेके

आँख लगाए खड़ी मे रहती
दरवाज़े पर प्रियतम लेके

प्यास जगाए आग लगाए
काले बदरा सावन लेके

कभी कभी तो मेरी आँखे
सूखी रहती सावन लेके

करती हूँ श्रँगार किसी दिन
प्रियतम कुमकुम गजरा लेके

अट्टहास करता है दर्पण
देखूँ यदि मे दर्पण लेके

जीती हूँ मैं  मृत सी हमदम
पंचतत्व का ये तन लेके

खीझ रहा हर कोना मुझ पर
तलवारें और बल्लम लेके

व्यथित पड़ा है बिखरा जीवन
कब लौटोगे बिंदौरी मेरा जीवन लेके

आमोद बिंदौरी

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