आलोचक संघर्ष...
एक आलोचक ने
तोड़ दी सारी हदे
कविता को
खड़ा कर दिया
चौराहे पर
केले के छिलके सा
उतार डाला
उसके जिस्म का
एक एक कपडा
जंगली जानवर सा
नोच डाला उसका तन..
मृत हो गयी
मेरी एक और कविता
इस संबिधान की
दुनिया में
नहीं दिखा
कोई संबिधान ज्ञाता
मै फिर लिखुगा
एक नयी कविता ...
संघर्ष करुगा
आलोचक रूपी दरिन्दे का....
एक कविता
इस बार नहीं नोची जाएगी
मेरी नयी कविता
वो लिखेगी
नया इतिहास
संघर्ष का इतिहास....
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