पसीने का एक बूंद
पसीने काबूंद
माथे से उपज
ठिठकता /चलता या बहता
निचे की ओर
रुख और अधरों
का सरोकार करते हुए
चुमते/बिदा लेते/रु-बरु
आ पहुचा ...
ह्रदय के पास
मन में अंगड़ाई ले
कहने लगा
मुझे कबूल कर ले
बस यहीं ठहर जाउंगा.....
मृदा को मर्दित करता
श्रमिक (किसान)
धराशाई करता है
थकावट /
और पसीने की बूंद की अर्जी
लगा रहता है
कर्म और मेहनत
का बिस्वास ले
तपती/
सूखी /बंजर /
जमीं को
सींचता है
पूरा दिन...
इस पसीने की बूंद से
कुछ दाने बोने
और कटाने के लिए.....
आखिर
अन्न दाता है
मिटाता है
सभी मुल्क /जाति /मजहब की
जठराग्नि..........बिना भेद
यही श्रमिक
खुद को जला
प्रकृति से संघर्ष कर
जीत कर
अशहाय /लाचार / मजबूर
अन्नदाता
लिखता है संघर्ष की
अमिट कहानी
संघर्ष की कहानी......
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