जिंदगी बस
पता नही ये गजल है भी या नहीं ...फिर भी जो लिखा पेश है। बस ऐसे पढ़ लीजिए ज्यादा खास नही है....
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
प्यार की सब किताबे धरी रह गई
रोज मिलते रहे दर्दों गम हर गली
जिंदगी बस कड़ी की कड़ी रह गई
खामोश आँगन मेरा सुगबुगाता रहा
आँखों में बारिश की झड़ी रह गई
खुशियाँ रूठी तो बाहर निकली इस कदर
दरवाजे की कड़ी लगी रह गई
कलम उछली खुद को नचनियां समझ
प्रे म पत्रों की तबियत बिगड़ी रह गई
जस्न मनाये तो बिंदोरी मनाये किस तरह
रोशनी बस घडी दो घडी रह गई
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