गजल---हम है राही मुहब्बत****

हम है राही मोहब्बत***
212/212/212/212
काफ़िया:-आ या
रदीफ़:- न कर
आमोद बिंदौरी
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हम है राही मुहब्बत बताया न कर
प्यार हैरत सें ऐसे जताया न कर
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आँख बह जाने दे देख बस तू ह्रदय
भीग जाये जो दामन सुखाया न कर
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जिंदगी की राह पर साथ आ हमसफ़र
पास रह के तू दूरी बनाया न कर
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क़त्ल करना है तो क़त्ल कर दे मुझे
धार चाकू दिखा कर डराया न कर
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जानता हूँ तू वैद्यो के घर से जुडी
दोस्ती में मेरी जखम खाया न कर
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प्यार मजहब कभी भी नही देखता
यार मजहब की भाषा सिखाया न कर
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सोंच मत हाँथ दे बे फिकर हम सफ़र
लुत्फ़ तू जिंदगी का घटाया न कर

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