जो मेरा जीवन है

जीविका और कर्त्तव्य
दोनों ही हावी है
और आदत
पीछा नही छोड़ती
नशा सा छाया है
रद्दी फटा पन्ना ले
अनजान न समझी
बातों को
शब्दांकित करने की.....

लकड़ी की पटी
पर लिखा
पहला क
मेरे जीवन का
अनमोल अक्षर था
वो मेरा
जीवन था .......

हा आज कुछ ओझल सा
पर याद है
माँ ने मेरा हाथ पकड कर
लिखाया था

वो ऊपर की लाइन टेठी
और चूल्हे और
बकरी पूंछ
ऐसे ही समझाया गया था

उस दिन वो पटी
घंटों में भरी थी....
वह वाह वाह कहते
मुस्कुराती माँ
गोद में ले
चूम रही थी........

वो सफ़र अब
आज भी है
पर उस जैसा
सुन्दर/सकून
वाह वाही भरा नही

आज मजबूर हूँ
जीविका के
संघर्ष  के आगे

जीविका और कर्त्तव्य
दोनों ही हावी है
पर आदत
पीछा नही छोड़ती
नशा सा छाया है
रद्दी फटा पन्ना ले
अनजान न समझी
बातों को
शब्दांकित करने की.....
और माँ को याद करने की.....
वही माथा चूमता प्यार
पाता हूँ ....
हर एक लेख पर
जो मेरा जीवन है.....

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