मैं एक इंसान हूँ

मैं एक असन्तुलित
बिचार रखने वाला
मानसिक उथल पुथल
में पलता सामाजिक
एक इंसान हूँ.....

वही हड्डी वही खाल
से ढका
पंच तत्व निर्मित
उन्ही ज्ञानेंद्रियों
कर्मेन्द्रियों में
चलित
वही सामाजिक
एक इंसान हूँ......

दायरे मेरे भी उतने है
पर असंतोष
रखता हूँ

मैं बनाना चाहता हूँ
एक अलग दुनिया
वही अलग दुनिया
जहा सारी पहलू
सब के सामने आ जाएं
और
उस दुनिया में
सब बराबर
सरोकारी इंसान हो.....

वो दुनिया जहा
जाति ,धर्म ,भेद
तुक्ष हो जाता हो
जहाँ  ईस्वर
इंसान की तरह
ही रहता हो
जहा हर इंसान
सुख से जीवन
व्यतीत करे
मैं इन भावनाओ
को पाले 
साधारण सा
एक इंसान हूँ....

मैं चाहता हु की
वो श्रजन
जो मेरी कलम से हो
समाज
का हर तरह से
सिर्फ लाभ प्रद हो
इस अभिलाषा
को लिए
जीवन पथ
पर
संघर्ष रत...
मैं  एक इंसान हूँ____
_©आमोद बिन्दौरी

मौलिक /अप्रकाशित

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