मुहब्बत का शहर हु मैं.....

मुहब्बत का शहर हूँ मैं
बहर :- 1222-1222-1222-1222

मुहब्बत का शहर हूँ मै मुझे बस प्यार होता है
मगर तनहा वही होता है जो खुद्दार होता है

शिकायत है मुहब्बत की की जो रूठा नहीं लौटा
सियासत है कि फितरत है नही ऐतबार होता है

कभी मिटता नहीं दिल से मुहब्बत का वो पहला गम
के दिल में बस गया कुछ भी नही उपचार होता है

अगर पतझड़ जो आया है तो हिस्से में बहारे हैं
ये किस्मत तब पलटती है जहाँ मजधार होता है

बदलता रुख हवाओं का जरा पहचान भी लो तुम
समय इक सा नही सबका साजन हर बार होता है

जरा चटपट जरूरी है ये रंगीन जीवन भी
कभी मजमा कभी आँशु कि क्या श्रृंगार होता है

बुरा अपना ये मजहब है ये कत्ले आम जनता का
ओ बिंदौरी सियासत में नही कोई यार होता है

मौलिक /अप्रकाशित

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