हे ज्ञान

हे ! ज्ञान
अब तू ही कुछ कर.....
दिखा कोई राह ...
उंगली थम मेरी /
बचपन में मेरी माँ की तरह /
और मुझे चलना सिख दे !
वो  डाल दे मोह फ़ाश/  माँ के जैसा /जब परेशां हु  दोड़ता हुआ तेरी गोद में  आ जाऊ
तू सहला के 
मेरे माथे को चूम ले
और 
निश्फ़िकर
तेरी गोद में निश्चिंत निंद्रा में
सो जाऊ......
सक्षम हो जाऊ
तौलने पर ... झूठा और सच्चा
व्यक्तित्व
जबरन सिखाना पड़े
झूठ और फरेब.....

न ठगना पड़े किसी /मानस का  विस्वास

न बेचना पड़े अपना व्यक्तित्व /सरे बाजार

न हु द्रष्टि बाधित ऐसा/ की रवि भी नाकाम हो जाए

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