समर्पण
लघु कथा -समर्पण
पौधे ने बहती नदी को देखा तो बुजुर्ग बृक्ष से पुंछ _ "दादा ये जल इतनी तेज गति से कहाँ बहा जा रहा है।"
बृक्ष ने जवाब दिया:_ ये धारा सागर से मिलाने को व्यकुल है ।
पौधे ने फिर पूंछा - पर्वत जैसी ऊंचाई को छोड़ इतनी दूर जाना कहाँ की समझदारी है।
बृक्ष- प्रश्न समझदारी का नहीं समर्पण का है। बिना सागर में विलय हुए नदी का जीवन व्यर्थ है।
अर्थात
जीवन का आनंद समर्पण और साथ में है । नाकि एकांकी जीवन में ---आमोद बिन्दौरी
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