दिनरात चिरागों सा जला अपने वतन में
बह्र:-221-1221-1221-122
रुतबा -ए-उजाला है मिया अपने वतन में।
अब चैन मुहब्बत ओ मजा अपने वतन में।
अनपढ़ सा अंधेरा है मिटा अपने वतन में।
जैसे कोई खलिहान सजा अपने वतन में।।
वो रोज मुझे याद है वो ख़ूनी नजारा।
जब जुल्म से इन्सान लड़ा अपने वतन में।।
मुश्किल से हवा देश में लौटी है अमन की।
मजहब की न अब आग लगा अपने वतन में।।
बस चैन मुहब्बत -ओ-दुआ फर्ज के खातिर।
दिन रात चिरागों को जला अपने वतन में।।
आमोद बिन्दौरी
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