मय वो दौलत है
बह्र:-2122-1122-1122-22
उसने ख़त लिख्खे गुलाबी वो कहाँ तक पहुँचे।।
मेरा दावा है रकीबों की जुबाँ तक पहुँचे।।
आह मत ले तु गरीबों की अमीराँ हो कर।
छोड़ दौलत को दुआयें ही वहाँ तक पहुँचे।।
दौरे हाजिर में मुकाबिल है कहीं भी बेटी।
मेरी ख्वाहिस है बुलंदी के मकाँ तक पहुँचे।।"
खुद खुदा ने ही खुदाई की खिलाफत करदी।
बे समय पानी ये पत्थर भी किसां तक पहुचे।।
नाम लेना भी गुनाहों में गिना क्यों तुमने।
मय वो दौलत है जो जन्नत से यहाँ तक पहुँचे।।
आमोद बिन्दौरी
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