मेरी यादें

बुजुर्ग सजर आज खाना पानी
बंद कर चूका है
पूरी जिंदगी के
हर झापेड़े सह कर
भी
चुप चाप है
आँख खुली है
साँस प्रवाह मंद है
इक नदी के समान
जो हिमालय की ऊचाई से
उपज कर
दुरगम रास्तों से जूझ कर
समन्दर के करीब है
और समर्पित होना चाहता है
उसके पास है
अद्म्य साहस,
ज्ञान का अथाह भण्डार
और प्रेम की अलिखित परिभाषा
रिश्तों की शातिर पहचान
और भी बहुत कुछ
जो समंदर की लहरों में
एक राख के ढेर की तरह
एक झोंके सा
विलेय हो जायेगा....

अमोद बिंदौरी
अपने नाना स्वा श्री भगवान प्रसाद श्रीवास्तव
की स्मृति में..
मेरे जीवन में मेरी पहचान सिर्फ मेरे नाना ही हैं।मैं जीवन के हर क्षण में उनका प्यार धरोहर की तरह ज़िन्दा रखना चाहता हूँ
मेरे बचपन के वो पल  जो मेरे जिंदगी का हिस्सा हैं मेरे नाना के साथ गुजरे
अ से लेकर ज्ञ  तक
0 से 1 तक जितना भी है
उनकी ही मेहनत और लगन का कमाल है
नाना मैं कभी आप को भूल नही पाऊंगा ।।।

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