इक तेरी तस्वीर और अंतिम तेरा वो फैसला 2
बह्र 2122-2122-2122-212
एक है मंदिर ओ मस्जिद, एक है सब का खुदा।
दे जो जिस्मों को रहा है , हर कदम पर हौसला।।
बढ़ रहा हूँ कुछ कदम मैं , कुछ कदम ठहरा हुआ ।
अब बहुत उलझा रहा है जिंदगी का रास्ता।।
मन में मेरे कर रहा है हौसले से द्वन्द सा ।।
इक तेरी तस्वीर और अंतिम तेरा वो फैसला।।
चल चलें कुछ दूर पैदल, दो कदम मंजिल बची ।
दो कदम सायद के चलकर सोंच पायें क्या मिला।।
ना कभी ओझल ये लम्हा हो मेरे इस जहन में ।
इसमें है अहसासे उलफत ,इश्क में जो भी मिला।।
जीस्त बेशक़ आ खड़ी अपने मुकम्मल ठौर पर।
मौत दर को खटखटा अब कर रही ये इत्तला।।
खर्च जिनपर कर दिए हम जिंदगी भर की कमाई।
मुझसे अब वो पूछते हैं जिंदगी भर क्या किया ।।
खोज अभी है अधूरी , काश के मिल जाए वो ।
जिंदगी भर गुनगुना लूँ , हो मुकम्मल काफिया ।।
आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित
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