सोंच को इक तीर करती है
सोंच को इक तीर करती है।
बह्र -212-221-221
सोंच को इक तीर करती है ।।
कुछ यूँ ये तस्वीर करती है।।
कुछ भी हो की बात कर और।
मन में हलचल पीर करती है।।
दर्द उलफत है ये सायद की।
दिल को रिसता नीर करती है।।
सुन सुनाई दे रहा कुछ यूँ।
ये हवा तपशीर करती हैं।।
बा वफ़ा या बेवफा ना वो।
फैसले तक़दीर करती है।।
जिंदगी भी बाद उलफत के।
पैरों में जंजीर करती है।।
खुद को पत्थर से रगड़ने के।
बाद नर्तन शमशीर करती है ।।
आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें