दे रहा है जो जिस्म का हर कदम पर हौसला
बह्र 2122-2122-2122-212
दे रहा है ज़िस्म को जो दर कदम पर इक सिला।।
इक तेरी तस्वीर और अंतिम तिरा वो फैसला।।
खंडरों की शानों शौक़त दिन ब दिन बेहतर हुई।
जैसे पतझड़ कह रहा हो लौट मुझको मय पिला।।
बढ़ रहा हूँ कुछ कदम, हूँ कुछ कदम ठहरा हुआ।
बाद तेरे टूटने जुड़ने लगा है हौसला।।
ना कभी ओझल हुआ था,ना ही ओझल हो कभी।
इसमें है अहसासे उलफत ,इश्क का जो भी मिला।।
चल चलें कुछ दूर पैदल, दो कदम मंजिल बची ।
दो कदम सायद के चलकर सोंच पायें क्या मिला।।
जब फ़िजा ने रंग बदले ,जिंदगी ने राह जब।
जब हवायें तेज तूफानी चली तब घर जला।।
जीस्त बेशक़ आ खड़ी अपने मुकम्मल ठौर पर।
मौत द्वारे खटखटा कर दे रही यह इत्तला ।।
आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित
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