कविता

विकास के लिए हौसला
विश्वास..
प्यार...
और सामंत सब चाहिए...
पर ऐसा
जो खुद भी समझाता हो...
उस मूक भाषा को..

जैसे.. कुम्हार.. मटकी पिटता है..पर टूटने नहीं देता...

तपाता है....तो कच्ची रहने नहीं देता
और बाजार में बेचता है...
मोह रहने नहीं देता..

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