गर बचेगा कुछ मिरा वो शाइरी ओऱ नेकियां

बढ़ गई जिस दौर रिश्तों की नमीं और दूरियाँ
बह्र:-2122-2122-2122-212

बढ़ गई जिस दौर रिश्तों की नमीं और दूरियां ।।
खुद-ब-खुद लेनी पड़ी खुद को  खुद की सेल्फियां।।

जिसको समझा शान आखिर अब वोआकर के खड़ा।
मुँह चिढ़ाता दौर मेरा ,खुद -जनी  नाकामियां।।

नाम अब है गर्व का ,खुदग़रज ओऱ बे अदब।
झुकना अब न चाहता हैं नवजवां कोई मियां।।

   देश के होने लगे जब मज़हबी हालात यूँ।।
  राजनीतिक सेंकने लगते हैं  अपनी रोटियां।।

रास्ता सबका अलग, अब बँट ही जाना है हमें।
आ चलें कुछ दूर संग यादों की लेकर झलकियां।।

  है पता तुमको भी मैं न भूल पाऊंगा तुम्हे ।
  इश्किया यादें मुझे देती रहेगी झाप्पियां।।

कण हवाओं में यूँ गुम हो जाएंगे इस जिस्म के।
गर बचेगा कुछ मेरा ,वो शाइरी ओऱ नेकियां।।

आमोद बिंदौरी /मौलिक-अप्रकाशित

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