इस कदर है अधर से अधर का मिलन
इस कदर है अधर से अधर का मिलन।।
जैसे पछुआ पवन छू रही हो बदन।।
मेरे आगोश में यूँ सिमटना तेरा।
मुझको लगता मिले जैसे धरती गगन।।
दे रही उलझनें, आग बरपा रहा।।
ज़ुल्फ़ की ये शरारत ये भीगा बदन।।
मुझको आता नहीं स्वाद हाला का अब।
जबसे हासिल हुई है अधर की छुअन।
तूने नजरों से अपने पिलाया है क्या।
बिन पिये, बावला, झूमता तन बदन।।
आमोद बिन्दौरी / मौलिक
,©® Date-13-02-2019-time-12:14pm
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