समय के साथ भी सीखा गया है


समय के साथ भी सीखा गया है ।।
ये गुजरा दौर भी बतला  गया है ।।

मेरी मजबूरियां अब मत गिनो तुम ।
मेरे संग हो तो  सब देखा गया है ।।

सभी उस्ताद बनकर ही नहीं हैं।
मुझे अधभर में ही रख्खा गया है ।।

ये तेरा प्रेम कब छूटेगा मुझसे ।
मेरे चहरे में ये बस सा गया है ।।

मेरे भी चाहने वाले मिलेंगे।
मुझे कहकर यही बिछड़ा गया है ।

कभी वो इन्तेहाँ मेरा भी ले ले।
जो मंजिल की तरफ रस्ता गया है।।

सलोना मुस्कुराता एक चहरा ।
मुकम्मल झूठ पर पहना गया है।।

जमाना क्या कहेगा क्या सुनेगा ।
नसीहत को सदा रौंदा गया है।।

कोई कमजोर तबक़ा कब उठा है ।
सियासी खेल पर  खेला गया है।।

आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

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