मुमकिन है मुहब्बत की हर बात मुहब्बत से
२२१-१२२२-२२१-१२२२
मुमकिन है मुहब्बत की हर बात मुहब्बत से।।
जाहिर तो करो तुम कुछ जज्बात मुहब्बत से ।।
कुछ दिन जो ठहर जाते वीरान नहीं होते ।
मे'रे' गीत ग़जल मुक्तक नग्मात मुहब्बत से ।।
माना कि मेरे रब से मेरी ही नहीं बनती ।
फिर भी वो मेरे वालिद कर बात मुहब्बत से ।।
आँखों से मेरी चाहो तो खून बहा दो तुम ।
ख़ाली न कभी होगी अब गात मुहब्बत से ।।
महफ़िल की वो ख़ामोशी गा गा के सुनाते क्या ।
चुप बैठ गए सब ही हज़रात मुहब्बत से ।।
आमोद बिंदौरी, मौलिक -अप्रकाशित
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