प्रतिबिम्ब
(प्रतिबिम्ब )
मै उस दिन उन आंखों में बहुत कुछ तलाश रहा था
जैसे कोई विश्वास ... जो कमजोर हो रहा था
या कोई झूठा वादा....... जो किसी कल के लिए किया गया हो
अतीत और वर्त्तमान के तराजू में
अपने रिश्ते के भविस्य की तुलना करना
उस दिन मुझे अच्छी तरह से आ गया था
मै कितनी तेज गति से
अपने बीते पलों को रिवाइंड कर रहा था
मै सांप सूंघने की मुद्रा में जरूर था
लेकिन अंदर एक अंतर्द्वंद चल रहा था
जैसे समन्दर में ज्वार आ गया हो
शब्द कोष के सारे अक्षरों के मायने
क्षीण होते जा रहे थे
जीवन संघर्ष की ये कौन सी कड़ी थी
कौन सा पल था
जिससे मै न सोंच सका था न समझा सका था
इंसान जीवन की विविधताओं से कुछ न कुछ सीख जरूर लेता है
उस दिन मुझे भी एक सीख मिली
वो सीख जो न किताबों में कभी पढ़ी थी न आंकलन की थी
जिसमे संसार के कोई नियम लागु नहीं हो पा रहा था
प्रतिबिम्ब अनसुनी भावनाओ का ...... जो भविष्य का अलग नजरिया देगा। ....... क्रमशः
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