अभिव्यक्ति

बहुत थम के बात करती हो 
मुस्कुराती हो अलग सा 
पहचान छिपा के रखती भी हो 
जाहिर भी करती हो ..तुम हो 
सब जानना है तुमको ..बारे में मेरे 
ठिठकाव है ...फिर पूछती कुछ और हो 
पढ़ी लिखी हो ...जहां में डर है 
कोई हादसा भी हुआ है जैसे ...
मेरी चिंता ......कौन हूं मैं ?
मैं भी परिपक्व हूं ..अब 
झांसा , बहकावा , मतवलापन 
लालच, मोह, लोभ नही है ...
कैसे ..........हो पाएगा ???
रिश्ता .....दोस्ती का ..
जीवन चरित्र है ......जीवन संघर्ष 

आमोद बिंदौरी ©® 



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