जरूरत ! दृश्य, अदृश्य
जरूरत !
हर एक सामाजिक प्राणी की कुछ जरूरतें होती हैं। जिन्हे मैं दो भागो में देखता हूं । एक अदृश्य, दूसरी दृश्य , दृश्य में धन, उसका रहन सहन, दोस्त, घर ,गाड़ी ,परिवार को रखता हूं। तो अदृश्य में प्रेम, स्नेह,व्यवहार, feel, सांत्वना, मार्गदर्शन जैसी चीजों को व्यवस्थित करता हूं। उम्र के साथ साथ इन सभी चीजों का ग्राफ लगातार अपडेट होता रहता है। कभी किसी चीज की जरूरत ज्यादा होती है कभी किसी की जरूरत कम होती है । अगर आप के पास अदृश्य चीजें नही हो तो इनमें आयाम स्थापित करूं तो समजस्य रखना काफी कठिन होता है । यह मेरा स्वयं का अनुभव रहा है । जिसकी वजह से मुझे कई साल तक जीवित मृत जीवन जीना पड़ा है । समाज के लिए मैं एक जीवित इंसान था लेकिन मेरे अंदर की कलात्मकता ( सौंदर्य) मर रहा था । मेरे लेखन के ख्याल जो की मेरे जीवन का सौंदर्य है। वो सब पिछले कई सालों में खतम हो गया है । अच्छा ये हुआ कि स्प्रिचुअल सहारा मिला जिसने मुझे पूर्ण खत्म होने से बचाया है । ये वही अदृश्य जरूरत थी जो कही खो गई थी।
हम इंसान हैं इसलिए इंसानों में ही ये सब चीजें खोजते हैं। लेकिन ज़रूरी नही है की आप को आस के अनुरूप आप के सामने वाला इंसान आप को वो अदृश्य चीज दे पाए । यह एक नशे जैसा है । अगर हमे किसी से थोड़ा मिला तो हमारी चाह उसे और ज्यादा होती जाती है । उदाहरण स्वरूप आप प्रेम को ले सकते हैं।
किसी लड़की की तरफ आप का स्नेह होता है। उसको भी जरूरत है । वो भी आप से प्रेम में लिप्त हो जाती है। फिर एक समय उसेआप से बेहतर दृश्य चीज देने वाला मिला जायेगा तो निश्चित ही उसका रुख उसकी ओर हो जाएगा फिर आप की आदत जो आप को उस इंसान से मिल रहा था नही मिलेगा आप व्यथित हो जायेगे ।
ये बहुत सीधा सिद्धांत है। हमें अपने अनुरूप ही अपनी जरूरतों से लिप्त होना चाहिए,
पांव उतन पसारिए जैसी चादर होय!
सर खुले न पांव , जीवन सुखमय होय!
जीवन तराजू के आयाम की तरह भविष्य और अतीत में सामंजस्य स्थापित करना सिखाता है । अध्यात्म आप की अदृश्य जरूरत को पूरी करता है । इसलिए खाली दृश्य चीजों में जीवन को लिप्त रखा मूर्खता है । यह कभी भी आत्म शांति की राह में नही ले जा सकती ..#आमोद_बिंदौरी
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