क्या कहूं?...
सोंचा ...
आज की रात न सोऊं!
इसे दिन कह लूं....
घड़ी इस चाह में उतारी
के वक्त थम जाए ..
मैं चांद को मान लूं
सूरज का अरुणोदय ..
फिर टिम टिमाते तारों को क्या कहूं?
घुप्प अंधेरे में भी उल्लू देख रहा है
तिलचट्टो की बान...
पड़ोसी मेढको की चौपाल ...
कुछ अनसुनी धुने...
इस दिन के सफर को और क्या कहूं?
पनघट से आवाज ...
गागर के गले का फंदा..
अस्सी हांथ लम्बी आशाएं
और एक मैं.......क्या कहूं??
#आमोद_बिंदौरी
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